| आली आपली चाळिशी |
| गेले ते बालपण |
| तरुणपण सुद्धा ओसरले, |
| आमच्या मित्र-मैत्रिणींना |
| बघा चाळीशीने घेरले. |
| बघता बघता आयुष्याची |
| शैक्षणिक वर्षे संपली, |
| घरादाराची जवाबदारी येऊन |
| कामाला सर्व जुंपली. |
| सकाळ झाली नाही की |
| कामावर जायची तयारी, |
| मुले बाळे घरोघरी |
| अक्षरशः घ्यावी लागते भरारी. |
| दिवसभर राबून राबून |
| लागतो दम सर्वांचा, |
| सायंकाळी घरी आल्यावर |
| भडिमार दिवसभराच्या कर्मांचा. |
| शरीराचे दुखणे खुपणे, |
| नाना व्याधींनी ग्रासले, |
| विविध रंगाच्या औषधांनी |
| आपले बेडरूम आहे सजले. |
| मुलांना बघून आजही |
| आपले बालपण आठवते, |
| काय मित्रांनो, काय म्हणता… |
| अधूनमधून आठवणींतून… |
| शालेय जीवन डोकावते ? |
| म्हातारपणाकडे वाटचाल |
| आता आपली सुरू आहे, |
| चाळिशीनंतर आता खरी |
| परिवाराची भिस्त…. |
| आपल्या खांद्यावर डोलत आहे. |
| “कविमोल” अमोल बारई |
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